कुछ नन्हे हाथों को आज हाथ छुडाते देखा है
उन कोमल से हाथों पे आज छालों का गुलदस्ता देखा है
तपती कँकरीली धरती पे दिन भर रेंगते देखा है
खाने के चंद निवालों पे मैंने उनको पिटते हुए देखा है
भूख मिटाने की खातिर यहाँ रूह नाचती देखी है
हर गाड़ी में झाँकती उनकी टपकती आस देखी है
हँस कर जीने की आशा को आँखों में बहते देखी है
एक सिक्के की खातिर आज मैंने ज़िन्दगी भागती देखी है। …!!!
दोस्तों क्या यही हमारा हिन्दुस्तान है ? दिल मायूसी से टूट कर बिखर सा जाता है जब रोज दिल्ली जैसे शहरों में इन भारतवासियों को यूँ जिंदगी गुजारते देखता हूँ।

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